दोस्तों हमारी आँखों का इलाज तो डॉक्टर कर सकता है, पर हमारी देखने की नजर का इलाज कौन करेगा। हमारी नजर का इलाज तो दोस्तों सिर्फ हमें ही करना पड़ेगा। हममे लाख बुराई होते हुए भी हमें लोग अच्छी नजर से देखते है। किसी की एक खामी पे इतनी घृणा क्यों। कमिया निकालने में तो बहुत लोग मिल जाएंगे। पर अच्छाई कुछ ही लोगो को दिखाई देती है।

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एकबार स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण परमहंस से पूछा की, भगवान् को कैसे देखे। भगवन कैसे दिखाई देंगे। तब राम कृष्ण परम हंस कहते है, जब मैले आईने में हमें हमारा प्रतिबिम्ब मैला दिखाई देगा। और स्वच्छ आईने में हमें हमारा प्रतिबिम्ब स्वच्छ दिखाई देगा। वैसे ही मैले मन से नहीं दिखाई देंगे। जब हम अपने मन को स्वच्छ, पवित्र कर लेंगे तब हमें भगवान् दिखाई देंगे।

अगर हमें कोई व्यक्ति या कोई चीज अच्छी दिखाई दे, तो ये जरुरी नहीं की वो व्यक्ति या वो चीज अच्छी ही होगी। पर एक बात तो सच है, की उसमे अच्छाई देखने की काबिलियत हमारी थी। तो इसमें अच्छी बात ये है, की थोड़ी बहुत अच्छा देखने के गुण हममे है।

अगर हमारे विचार पवित्र होंगे, तो हर सख्स में हमें भगवान् नजर आएंगे। स्वामी विवेकानंद का एक विचार है, लगातार पवित्र विचार करते रहे, बुरे संस्कारो को दबाने का एक मात्र समाधान यही है।

दुनिया बदले या न बदले, पर हमारी नजर बदल जाएगी, तो हमारे लिए पूरी दुनिया बदल जायेगी।