एक जंगल मे कछुआ और खरगोस रहते थे। एक दिन खरगोसने कछुए से कहा चलो दौड़ने की हरिफाई करते है। तब कछुए ने कहा नही यार तुमतो बहुत फ़ास्ट दौड़ते तो भला में तुमसे कैसे जीत सकता हु। तब खरगोस ने कहा क्या तुमने खरगोस और कछुए की कहानी नही सुनी है क्या?. उसमे तो कछुआ जीत जाता है। कछुआ मान गया और बोला चलो दौड़ शुरू करते है।

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 कछुए और खरगोस के बीच दौड़ शुरू हो जाती है। खरगोस दौड़ते-दौड़ते बहुत दूर चला गया। पर कछुआ धीरे-धीरे चल रहा था। अब खरगोस बहुत दूर जा चुका था। खरगोस ये सोच रहा था, की अब में अपनी मंजिल के बहुत करीब हु। खरगोस को पेड़ के नीचे बैठने का मन हुआ, पर उसे उसके पूर्वजो की दौड़ याद थी। इसलिए वो पेड़ के नीचे बैठा नही। वो सोच ने लगा कि में बैठूंगा तो में सो जाऊंगा इसलिए में बैठूंगा नही। पर उसे बहुत भूख लगी थी। उसने सोचा कि चलो कछुआ तो अभी बहुत दूर है। उसे यहाँ तक आने में एक घंटा और लगेगा। तब तक इस बाजू के खेत से कुछ खाके आता हु। जब खरगोश वहा कुछ खाने के लिए गया और फिर उसे प्यास लग गयी और वो पानी पिने के लिए नदी के किनारे गया फिर पानी पाया तब तक एक कहता हो चुका था। और कछुआ अपनी मंजिल तक पहुंच चूका था।

इस कहानी से ये सिख मिलती है।

तो दोस्तों हमें इस कहानी से ये सिख मिलती है, की कछुए की तरह हमें धीरे-धीरे अपनी मंजिल की तरह बढ़ाते ही रहना चाहिए। ताकि सफलता चाहे थोड़ी देर से मिल पर धीरे-धीरे चलते ही रहना चाहिए। खरगोश को अपने आप पर ओवर कॉन्फिडेंस था। इस वजह से वो हार गया।